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शिक्षक को भगवान का रूप माना जाता है। कहते हैं कि हमारे जीवन को संवारने और संभालने में गुरु का बहुत बड़ा हाथ होता है। तभी गुरु को ब्रह्मा, विष्णु व महेश का रूप कहा गया है। शिष्य के जीवन को बनाना, चलाना व उसका विनाश करना भी एक तरीके से गुरु के हाथ में ही होता है। गुरु से हमें सबसे बड़ा दान, यानि विधा का दान मिलता है। जो हमें योग्य बनाता है। कहा गया है कि बिना विधा मनुष्य पशु के समान है। और हमें पशु से मनुष्य बनाने का काम यही हमारे गुरु करते हैं। और यह भी कहा गया है कि गुरु बिन ज्ञान अधूरा। क्योंकि मनुष्य को ज्ञान देना वह उसे संवारने का काम गुरु ही करते हैं |

IMAGE - SANSATTA

गुरु-शिष्य परम्परा बहुत प्राचीन है। जब श्री विष्णु जी के अवतार इस धरती पर आए तो उन्होंने भी अपने-अपने गुरु से शिक्षा प्राप्त की थी। श्री कृष्ण जी के गुरु सांदिपनी जी थे। और श्री राम जी के गुरु वशिष्ठ जी थे। उस समय की गुरुकुल परंपरा के अनुसार दोनों ने शिक्षा प्राप्त की थी।

इस संदर्भ में महाभारत की एक बहुत ही लोकप्रिय कथा है। पाण्डवों और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य जी थे। वह सभी राजकुमारों को हर तरह की शिक्षा दिया करते थे। वहीं एक और बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आया था। परंतु उसे शिक्षा नहीं दी गई थी। कारण कई थे। पर उस बालक ने छिप कर (जब गुरु सारे राजकुमारों को सीखा रहे होते थे) सिर्फ देखकर ही शिक्षा प्राप्त कर ली थी। और जब गुरु द्रोणाचार्य को पता चला कि उसने बालक ने छिप कर सब कुछ सीख लिया है तो उन्होंने उसे बुलाया और कहा कि तुमने छिप कर ही सही सारी शिक्षा, सारी विधायें सीख ली हैं। परंतु गुरु दक्षिणा नहीं दी। तब वह बालक बोला- कि आपने तो मुझे अपना शिष्य नहीं माना पर मैंने आपको अपना गुरु मान लिया था। इसलिए आप आज्ञा करें कि आपको क्या दक्षिणा में चाहिए। इस पर गुरु बोले-कि तुम मुझे अपना अंगूठा काट कर दे दो। बालक ने एक बार नहीं सोचा और अपना अंगूठा दे दिया। वह बालक धनुर्विद्या में बहुत अच्छा था। धनुर्विद्या में यह बालक अर्जुन के बराबर था। जानते हो वह बालक कौन था? वह थे महान एकलव्य‌। यहां इस कहानी को बताने का आशय यह है कि हमारी परम्परा में गुरुओं को कितना मान दिया जाता हैं।

हमारे भारत में ५ सितंबर को अध्यापक दिवस अथवा (Teacher’s Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन एक महान शिक्षक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का जन्म हुआ था। प्रतिवर्ष उनका जन्मदिन इसी प्रकार मनाया जाता है। वह एक महान शिक्षक थे। इनका जन्म १८८८ में हुआ था। यह भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी रहे है। इस दिन स्कूलों में बड़ी कक्षा के छात्र-छात्राएं अध्यापक बन कर स्कूल संभालते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या आजकल के बच्चे, अब भी अपने शिक्षकों का उतना ही सम्मान करते हैं। या अब समय में बदलाव आ गया है। पहले जहां गुरु के आगे बच्चे बोल नहीं पाते थे, वहीं आज बच्चों को अपने शिक्षकों के साथ बहस करते देखा गया है। आजकल अगर कोई शिक्षक किसी को डॉट दें तो बच्चों को इतना बुरा लगता है। उन्हें लगता है कि उनकी बेइज्जती हो गई है। अध्यापक की चाल-ढाल, बोलने का तरीका, व कपड़ों का मज़ाक उड़ाया जाता है। जो की बहुत ही गलत बात है। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारे मां-बाप भी तो हमें गलती करने पर डांटते हैं। आज के समय में की शिक्षक है जो अपने कर्त्तव्यों को भूल चुके हैं। अपने काम के प्रति उनका लगाव ही नहीं है। मन किया पढ़ाया, मन किया नहीं पढ़ाया। थाली दोनों हाथों से बजती है। इसलिए बच्चों को चाहिए कि वह अपने शिक्षकों को पूरा सम्मान दें। क्योंकि वह अगर डांटते भी है तो हमारी भलाई के लिए ही डांटते हैं। और शिक्षकों को भी चाहिए कि वह अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाऐ।
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