भारत के गुरुकुल कैसे खत्म हुए जानिए राज

भारत के गुरुकुल कैसे खत्म हुए जानिए राज

गुरुकुल - भारतवर्ष मे सब स्कूल नहीं थे तब भारत मे शिक्षा का प्रचार प्रसार गुरुकुल द्वारा होता था लेकिन समय के साथ गुरुकुल खत्म हो गए इसके पीछे छुपा है कई सारे राज | आपको जानकार आश्चर्य होगा गुरुकुल को बर्बाद करने के लिए बनाए गए थे कॉन्वेंट स्कूल, सन 1858 मे मे इंडियन एजुकेशन एक्ट बनाया गया जिसकी ड्राफ्टिंग लॉर्ड मैकाले द्वारा कराया गया था | bharat ke gurukul kaise khatm hue

भारत मे कॉन्वेंट स्कूलों के शुरुवात से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे मे रिपोर्ट जारू हुई थी यह रिपोर्ट अंग्रेज़ो के अधिकारी G.W. Litnar, Thomas Munro के द्वारा जारी किया गया था | इन दोनों अधिकारियों ने अलग अलग इलाको का सर्वे किया था |
gurukul shiksha

गुरुकुल खत्म क्यो किए गए -

यह बात सन 1823 के आसपास की है जब लिटनर द्वारा उत्तर भारत का सर्वे किया गया और लिखा उत्तर भारत मे 97% साक्षारता है | साथ ही मुनरो द्वारा दक्षिण भारत का सर्वे किया गया और उसने लिखा दक्षिण भारत मे 100% साक्षरता है



इस सर्वे से साफ पता चलता है कि कॉन्वेंट स्कूलों के आने से पहले भारत मे सबसे अधिक साक्षरता थी ...
मैकाले ने कहा .........
अगर भारत को युगो युगो तक गुलामी की जंजीरों मे बांधना है तो भारत की "देशी एंव सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था" को पूरी तरह से खत्म करना होगा साथ ही भारत मे अँग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी | तभी इस देश मे हिन्दुस्तानी और दिमाग से अंग्रेज़ पैदा होंगे |इस तरह के हिन्दुस्तानी जब यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो वह हमारे हित मे काम करेंगे | फिर मैकाले द्वारा एक मुहावरा इस्तेमाल किया गया |

“कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।

गुरुकुल खत्म करने की योजना -

  • सबसे पहले अंग्रेज़ो ने गुरुकुल को गैरकानूनी घोषित किया |
  • जब गुरकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज से मिलती थी वह भी गैरकानूनी हो गए |
  • इसके बाद संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया |
  • देश मे घूम घूम कर सभी गुरुकुल को खत्म किया साथ ही गुरुकुलों मे आग लगा दिया |
  • गुरुकुल मे पढ़ाने वाले गुरुओ को मारा पिता एंव जेल मे भी डाला गया |
  • सन 1850 के आसपास भारत देश मे 7 लाख 32 हजार के आसपास गुरुकुल थे जो आज की भाषा मे कह सकते है ‘Higher Learning Institute" हुआ करते थे |
  • गुरुकुल मे 18 भाषाओ को पढ़ाया जाता था एंव इस गुरुकुल को समाज के लोग मिलकर चलाते थे जिसमे निशुल्क शिक्षा व्यवस्था हुआ करती थी |
इस तरह सभी गुरुकुल को खत्म कर दिया गया साथ ही अँग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित कर दिया गया |
गुरुकुल खत्म हुए फिर कॉन्वेंट स्कूलों की शुरुवात जिसे "फ्री स्कूल" के नाम से जाना जाने लगा | इसी कानून के तहत कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गई, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि - 
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।

यह चिट्ठी भले ही उस समय लिखी गई हो लेकिन इस चिट्ठी की सच्चाई अब हमे साफ साफ दिखाई दे रहा है | आप खुद देख लीजिए भारत मे कितने ऐसे है जिन्हे अपनी मातृभाषा हिन्दी बोलने पर गर्व है, आज उसी एक्ट का नतीजा है जो लोग आज मातृभाषा हिन्दी को बोलने मे शर्म करते है | हमारी पीढ़ी सोचती है अँग्रेजी बोलने पर दूसरों पर इंप्रेशन बनेगा | हम तो खुद मे ही लापता है जिसे हिन्दी अपनी भाषा बोलने मे शर्म आ रही है तो क्या आप दूसरे मे इंप्रेशन बनाओगे |

अँग्रेजी की सच्चाई भी देख लीजिए - 
लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी |

अगर आपको अपनी मातृभाषा हिन्दी पर गर्व है तो हिन्दी मे जय हिन्दी जय भारत लिखे एंव लोगो तक इस संदेश को शेयर करके पहुचाए | जिससे किसी को हिन्दी बोलने मे शर्म महसूस न हो |
Crow and Owls  कौआ और उल्लू की कहानी

Crow and Owls कौआ और उल्लू की कहानी

बहुत समय पहले की बात हैं कि एक वन में एक विशाल बरगद का पेड कौओं की राजधानी था। हजारों कौए उस पर वास करते थे। उसी पेड पर कौओं का राजा मेघवर्ण भी रहता था।


बरगद के पेड के पास ही एक पहाडी थी, जिसमें असंख्य गुफाएं थीं। उन गुफाओं में उल्लू निवास करते थे, उनका राजा अरिमर्दन था। अरिमर्दन बहुत पराक्रमी राजा था। कौओं को तो उसने उल्लुओं का दुश्मन नम्बर एक घोषित कर्र रखा था। उसे कौओं से इतनी नफरत थी कि किसी कौए को मारे बिना वह भोजन नहीं करता था।

जब बहुत अधिक कौए मारे जाने लगे तो उनके राजा मेघवर्ण को बहुत चिन्ता हुई। उसने कौओं की एक सभा इस समस्या पर विचार करने के लिए बुलाई। मेघवर्ण बोला “मेरे प्यारे कौओ, आपको तो पता ही हैं कि उल्लुओं के आक्रमणों के कारण हमारा जीवन असुरक्षित हो गया हैं। हमारा शत्रु शक्तिशाली हैं और अहंकारी भी। हम पर रात को हमले किए जाते हैं। हम रात को देख नहीं पाते। हम दिन में जवाबी हमला नहीं कर पाते, क्योंकि वे गुफाओं के अंधेरों में सुरक्षित बैठे रहते हैं।”

फिर मेघवर्ण ने स्याने और बुद्धिमान कौओं से अपने सुझाव देने के लिए कहा।

एक डरपोक कौआ बोला “हमें उल्लूं से समझौता कर लेना चाहिए। वह जो शर्ते रखें, हम स्वीकार करें। अपने से तकतवर दुश्मन से पिटते रहने में क्या तुक है?”

बहुत-से कौओं ने कां कां करके विरोध प्रकट किया। एक गर्म दिमाग का कौआ चीखा “हमें उन दुष्टों से बात नहीं करनी चाहिए। सब उठो और उन पर आक्रमण कर दो।”

एक निराशावादी कौआ बोला “शत्रु बलवान हैं। हमें यह स्थान छोडकर चले जाना चाहिए।”

स्याने कौए ने सलाह दी “अपना घर छोडना ठीक नहीं होगा। हम यहां से गए तो बिल्कुल ही टूट जाएंगे। हमे यहीं रहकर और पक्षियों से सहायता लेनी चाहिए।”

कौओं में सबसे चतुर व बुद्धिमान स्थिरजीवी नामक कौआ था, जो चुपचाप बैठा सबकी दलीलें सुन रहा था। राजा मेघवर्ण उसकी ओर मुडा “महाशय, आप चुप हैं। मैं आपकी राय जानना चाहता हूं।”

स्थिरजीवी बोला “महाराज, शत्रु अधिक शक्तिशाली हो तो छलनीति से काम लेना चाहिए।”

“कैसी छलनीति? जरा साफ-साफ बताइए, स्थिरजीवी।” राजा ने कहा।

स्थिरजीवी बोला “आप मुझे भला-बुरा कहिए और मुझ पर जानलेवा हमला कीजिए।’

मेघवर्ण चौंका “यह आप क्या कह रहे हैं स्थिरजीवी?”

स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण वाली डाली पर जाकर कान मे बोला “छलनीति के लिए हमें यह नाटक करना पडेगा। हमारे आसपास के पेडों पर उल्लू जासूस हमारी इस सभा की सारी कार्यवाही देख रहे हैं। उन्हे दिखाकर हमें फूट और झगडे का नाटक करना होगा। इसके बाद आप सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत पर जाकर मेरी प्रतीक्षा करें। मैं उल्लुओं के दल में शामिल होकर उनके विनाश का सामान जुटाऊंगा। घर का भेदी बनकर उनकी लंका ढाऊंगा।”

फिर नाटक शुरु हुआ। स्थिरजीवी चिल्लाकर बोला “मैं जैसा कहता हूं, वैसा कर राजा कर राजा के बच्चे। क्यों हमें मरवाने पर तुला हैं?”

मेघावर्ण चीख उठा “गद्दार, राजा से ऐसी बदतमीजी से बोलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?”कई कौए एक साथ चिल्ला उठे “इस गद्दार को मार दो।”

राजा मेघवर्ण ने अपने पंख से स्थिरजीवी को जोरदार झापड मारकर तनी से गिरा दिया और घोषणा की “मैं गद्दार स्थिरजीवी को कौआ समाज से निकाल रहा हूं। अब से कोई कौआ इस नीच से कोई संबध नेहीं रखेगा।”

आसपास के पेडों पर छिपे बैठे उल्लू जासूसों की आंखे चमक उठी। उल्लुओं के राजा को जासूसों ने सूचना दी कि कौओं में फूट पड गई हैं। मार-पीट और गाली-गलौच हो रही हैं। इतना सुनते ही उल्लुओं के सेनापति ने राजा से कहा “महाराज, यही मौका हैं कौओं पर आक्रमण करने का। इस समय हम उन्हें आसानी से हरा देंगे।”

उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को सेनापति की बता सही लगी। उसने तुरंत आक्रमण का आदेश दे दिया। बस फिर क्या था हजारों उल्लुओं की सेना बरगद के पेड पर आक्रमण करने चल दी। परन्तु वहां एक भी कौआ नहीं मिला।

मिलता भी कैसे? योजना के अनुसार मेघवर्ण सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत की ओर कूच कर गया था। पेड खाली पाकर उल्लुओं के राजा ने थूका “कौए हमारा सामना करने की बजाए भाग गए। ऐसे कायरों पर हजार थू।” सारे उल्लू ‘हू हू’ की आवाज निकालकर अपनी जीत की घोषणा करने लगे। नीचे झाडियों में गिरा पडा स्थिरजीवी कौआ यह सब देख रहा था। स्थिरजीवी ने कां-कां की आवाज निकाली। उसे देखकर जासूस उल्लू बोला “अरे, यह तो वही कौआ हैं, जिसे इनका राजा धक्का देकर गिरा रहा था और अपमानित कर रहा था।’

उल्लुओं का राजा भी आया। उसने पूछा “तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई?” स्थिरजीवी बोला “मैं राजा मेघवर्ण का नीतिमंत्री था। मैंने उनको नेक सलाह दी कि उल्लुओं का नेतॄत्व इस समय एक पराक्रमी राजा कर रहे हैं। हमें उल्लुओं की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए। मेरी बात सुनकर मेघवर्ण क्रोधित हो गया और मुझे फटकार कर कौओं की जाति से बाहर कर दिया। मुझे अपनी शरण में ले लीजिए।”

उल्लुओं का राजा अरिमर्दन सोच में पड गया। उसके स्याने नीति सलाहकार ने कान में कहा “राजन, शत्रु की बात का विश्वास नहीं करना चाहिए। यह हमारा शत्रु हैं। इसे मार दो।” एक चापलूस मंत्री बोला “नहीं महाराज! इस कौए को अपने साथ मिलाने में बडा लाभ रहेगा। यह कौओं के घर के भेद हमें बताएगा।”


राजा को भी स्थिरजीवी को अपने साथ मिलाने में लाभ नजर आया अओ उल्लू स्थिरजीवी कौए को अपने साथ ले गए। वहां अरिमर्दन ने उल्लू सेवकों से कहा “स्थिरजीवी को गुफा के शाही मेहमान कक्षमें ठहराओ। इन्हें कोई कष्ट नहीं होना चाहिए।”

स्थिरजीवी हाथ जोडकर बोला “महाराज, आपने मुझे शरण दी, यही बहुत हैं। मुझे अपनी शाही गुफा के बाहर एक पत्थर पर सेवक की तरह ही रहने दीजिए। वहां बैठकर आपके गुण गाते रहने की ही मेरी इच्छा हैं।” इस प्रकार स्थिरजीवी शाही गुफा के बाहर डेरा जमाकर बैठ गया।

गुफा में नीति सलाहकार ने राजा से फिर से कहा “महाराज! शत्रु पर विश्वास मत करो। उसे अपने घर में स्थान देना तो आत्महत्या करने समान हैं।” अरिमर्दन ने उसे क्रोध से देखा “तुम मुझे ज्यादा नीति समझाने की कोशिश मत करो। चाहो तो तुम यहां से जा सकते हो।” नीति सलाहकार उल्लू अपने दो-तीन मित्रों के साथ वहां से सदा के लिए यह कहता हुआ “विनाशकाले विपरीत बुद्धि।”

कुछ दिनों बाद स्थिरजीवी लकडियां लाकर गुफा के द्वार के पास रखने लगा “सरकार, सर्दियां आने वाली हैं। मैं लकडियों की झोपडी बनाना चाहता हूं ताकि ठंड से बचाव हो।’ धीरे-धीरे लकडियों का काफी ढेर जमा हो गया। एक दिन जब सारे उल्लू सो रहे थे तो स्थिरजीवी वहां से उडकर सीधे ॠष्यमूक पर्वत पर पहुंचा, जहां मेघवर्ण और कौओं सहित उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। स्थिरजीवी ने कहा “अब आप सब निकट के जंगल से जहां आग लगी हैं एक-एक जलती लकडी चोंच में उठाकर मेरे पीछे आइए।”

कौओं की सेना चोंच में जलती लकडियां पकड स्थिरजीवी के साथ उल्लुओं की गुफाओं में आ पहुंचा। स्थिरजीवी द्वारा ढेर लगाई लकडियों में आग लगा दी गई। सभी उल्लू जलने या दम घुटने से मर गए। राजा मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को कौआ रत्न की उपाधि दी।

सीखः शत्रु को अपने घर में पनाह देना अपने ही विनाश का सामान जुटाना हैं।
भूख और 2 बिल्ली की कहानी

भूख और 2 बिल्ली की कहानी

मैं और मेरी बेटी रसोई में काम कर रहे थे। मैं सब्जी काट रही थी, और मेरी बेटी आटा गूंध रही थी। तभी हमारे पास एक बिल्ली आई वैसे तो यह दो बिल्लियाँ हैं जो रोज हमारे घर आती है और एक-एक रोटी खाती हैं। उन्हीं में से एक बिल्ली हमारे पास आई थी। और मयाऊँ-मयाऊँ कर रही थी। मैं अभी रोटी बनाने वाली थी कि तभी हमने देखा कि मेरी बेटी के हाथ से गूंधा हुआ थोड़ा सा आटा नीचे गिर गया था। हमें यह देखकर हैरानी हुई कि वह बिल्ली उस आटे को खा गई। इससे यह पता कि वह कितनी भूखी थी, तभी मैंने झटपट रोटी बनाई और उसे व दूसरी बिल्ली को खिला दी। 
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देखा जाए तो यह एक आम घटना थी। परंतु इसमें खास थी- भूख। भूख इंसान हो या जानवर सभी को लगती है, और जब भूख लगती है तो कुछ नहीं सूझता। एक कहावत है कि “भूख में किवाड़ भी पापड़ लगते है”। यही वह भूख है जो इंसान को सब कुछ करने पर मजबूर कर देती है। हर इंसान यह चाहता है कि उसे व उसके परिवार को तीनों टाइम का अच्छा खाना मिले और इसके लिए वह जी जान लगा डालता है। हम इंसान ही नहीं बलिक जानवर भी अपने बच्चों का पेट भरने के लिये पहले उन्हें भोजन देते है। बड़े प्यार से उनके मुँह में खाना डालते है। 

परंतु कितने ही लोग है जिन्हें दो टाइम का खाना भी बड़ी मुशकिल से नसीब होती है। कितने ही भूखे बच्चे सड़को पर भीख माँग रह होते है। कई बार अपने बच्चों का पेट भरने के लिए आदमी को अपना जमीर बेचना पड़ता है। और कई बार भूख मिटाने के लिए लोग बुरे कामों का भी सहारा लेते है। इसलिए हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिये कि खाना कभी भी बेकार नहीं करना चाहिये। क्योंकि यह बहुत कीमती है। 

कई लोग बाहर सड़कों पर, मंदिर में भंडारे व लंगर लगाते है। ताकि प्रसाद लोगों में बाँटा जा सके। पर इनमें होता क्या है कि प्रसाद का आधे से अधिक हिस्सा तो उन लोगों के घर पहँच जाता है। जिन लोगों ने इसके लिये दान दिया होता है। 

जरा सोचिए उन लोगों को खिलाने का क्या फायदा जिनका पेट पहले से भरा है। यह तो वही बात हुई “कि भरे हुए गिलास में, और पानी डाल दिया जाये। 

हमें कई बातों का ध्यान रखना चाहिये कि भंडारे और लंगर हमेशा उन लोगों तक पहुँचने चाहिये जिनको इनकी अधिक जरूरत है जैसे- गरीब बच्चे, मजदूर, माँगने वाले और रिक्शा व ठेले वाले आदि। इसका फायदा यह होगा कि उन्हें एक समय का पेट भरकर खाना मिल जायेगा। यदि वह साथ थोड़ा ले जाने के लिये भी माँगे तो दे देना चाहिये। 

वहाटसऐप के जरिए एक सूचना भी साझी की गई है कि एक हेलपलाइन नं 1098 दिया गया है इसकी मदद से आप अपनी पार्टी, शादी में बचे हुए खाने को इस फोन नं के जरिए गरीब व अनाथ बच्चों के आश्रम तक पहुँचा सकते हो। जिससे खाना बेकार भी नहीं होगा और किसी की भूख भी मिट जाएगी. इसलिए आप सबसे मेरा निवेदन है कि खाना बरबाद न करें। क्योंकि कई लोगों को यह बहुत मुशकिल से नसीब होता है।
आखिर क्यों रुक जाते है मदद के लिए बढ़ते हाथ

आखिर क्यों रुक जाते है मदद के लिए बढ़ते हाथ

help meaning in hindi - मदद यानि सहायता. किसी कि मदद करना बहुत अच्छी बात है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और हम लोग एक ही समाज में रहते है. इसलिए हर मनुष्य को एक दूसरे की मदद की जरूरत पड़ती रहती है. मदद के लिए बढ़े हाथ को थामना चाहिए उसे हर संभव मदद देनी चाहिए. आजकल के लोग इतने मतलबी हो गए है कि वह किसी की मदद करना ही नहीं चाहते. जैसे कि कई बार बसों में देखा जाता है कि कई लोग महिलाओं और बूढ़े लोगों के लिए जो सीटें होती है उस पर बैठे रहते हैं जब तक उन्हें कहा न जाए. वह उन्हें सीट भी नहीं देते |
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यह तो उन लोगों की बात हुई जो मदद ही नहीं करना चाहते. और कुछ लोग ऐसे होते है जो की मदद करने पर फंस जाते है. यहाँ मैं अपना एक अनुभव बताना चाहती हूँ. कुछ समय पहले मैं एक कलीनिक पर काम करती थी. मेरी शाम की डयूटी होती थी. सर ५-६ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. पर मेरी डयूटी थी कि रोज शाम को कलीनिक खोलना. मैं और एक लड़का और था. हम रोज़ आकर कलीनिक खोलते थे. एक दिन वो लड़का भी नहीं आया. उस दिन में अकेली थी. कोई ७-७:३० बजे का वक्त था कि एक गरीब सी गर्भवती औरत अपने ४-५ बच्चों के साथ आई और कहने लगी-कि मेरी बेटी को चोट लगी है पट्टी करवानी है मैंने उसे कहा कि सर नहीं है और यहाँ पट्टी नहीं होती पर वो नहीं मानी. फिर कहने लगी कि मेरा दिल घबरा रहा है पानी पीना है मैंने उसकी बड़ी बेटी को कहा-कि आप बाहर से पानी ले लो. पर वो कहने लगी कि उसे वॉटर कूलर चलाना नहीं आता. मैंने भी सोचा हो सकता है कि सच में उसकी तबीयत खराब हो, यही सोच कर मैं पानी लेने जैसे बाहर गई उसके सारे बच्चे मेरे पीछे-पीछे बाहर आ गये और जब मैं पानी लेकर अंदर जाने लगी तो मुझे रोकने लगे, फिर उसकी बड़ी बेटी कहने लगी कि आप पानी मुझे दो मुझे प्यास लगी है यह बात मुझे अजीब लगी कि न तो मुझे अंदर जाने दे रहे है और सब मुझे घेर कर बाहर ही खड़े हो गये है मैंने गुस्से में कहा-कि यह रहा गिलास अब खुद पानी लो और उन्हें हटा कर मैं अंदर आ गई. जैसे ही मैं अंदर आई तो देखा कि वो औरत सर के केबिन से बाहर निकल रही थी. और कहने लगी कि चलो हम कहीं ओर से पट्टी करा लेंगे और झट वहाँ से सब जल्दी-जल्दी चले गये. मेरा दिमाग घूमा मैंने झट से सर का केबिन चैक किया सब कुछ ठीक था कुछ गायब नहीं था |

मैंने आराम की साँस ली और जैसे ही अपनी सीट पर बैठी मेरे होश उड़ गए मेरा बेग गायब था और ये समझते हुए मुझे जरा देर नहीं लगी कि वो औरत मेरा बेग ले गई है. अब यह भी समझ आ गया कि वो औरत गभृवती भी नहीं थी क्योंकि मेरा बेग काफी बड़ा था और जब वह औरत बाहर निकली तो मुझे उसके पास नहीं दिखा क्योंकि वो बेग को अपने नकली पेट में छिपा कर ले गई थी. जब तक मैं बाहर जाकर पूछती तब तक वह गायब हो गई थी. मैंने तो सिर्फ उसकी मदद करनी चाही थी क्योंकि मेरे मन में सिर्फ यही बात आई थी कि कहीं सच में उसे तकलीफ़ न हो़. पर हुआ क्या वो मेरा ही बेग उठा कर ले गई. क्योंकि कोई और सामान छिपा कर ले जाना मुशकिल था. मैं यह नहीं कहूँगी कि ऐसा मेरे साथ ही हुआ है. ऐसा कई बार कई लोगों के साथ हो चुका है |

कई बार सड़क के किनारे कोई बीमार या घायल बनकर बैठा होता है लोग उनकी मदद करने को रुकते है तो वह मौका देखकर उन्हें लूट लेते है. ऐसे में होता क्या है कि जब किसी सही इंसान को मदद की जरूरत होती है तो कोई उनकी मदद नहीं करता. क्योंकि सब को यही डर होता है कि कहीं वो चोर-लूटेरे न हो. इसलिए कभी भी, किसी भी सुनसान इलाके में अगर कोई मदद माँगें तो सोच समझ कर उसकी मदद करो. हर तरह से विश्वास कर लो कि वह सही है या नहीं. यही कारण है कि ऐसे लोगों के कारण सही जरूरतमंद लोग भी मदद से वंचित रह जाते है.
शादीशुदा पति पत्नी के कोड वर्ड

शादीशुदा पति पत्नी के कोड वर्ड

कोड वर्ड मे बात कैसे करे अकसर हम अपने दोस्तो या अपनी परिवार मे कोड वर्ड बातचित के दौरान करेट है लेकिन क्या आपके बचपन मे सुना कोई ऐसा वर्ड हो जो बाद मे सझ मे आया हो यह एक Code Word था | Code Word kya Hai और कोड वर्ड कैसे बनाए आइये जाने |
हमे पुराने दिनो की कितनी बाते याद होती है ? अगर इस पर विचार किया जाए तो समझ मे आता है कि यह समय पर निर्भर नही होता है ऐसी बहुत सी बाते होती है जिसको बीतने का समय काफी पुराना होता है लेकिन वह बाते हमारे दिमाग मे बस जाती है और लगता है जैसे अभी कल की बात है | इसके उल्टा भी है जैसे कल परसो की बाते भी हमे नही याद होती है |

हमारे बचपन के दोस्त चंद्र प्रकाश गौतम को अच्छे से याद है की किस तरह गाँव मे बहते नहरों मे नहा लेने पर उसकी दादी हाथ मे दंडी लेकर उसके पीछे दौड़ती थी साथ ही नहर के गंदे पानी के नुकसान हाथ हवा मे ले जाकर बताती थी |

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वही दूसरी तरफ उसके जिंदगी के मधुर यादे अगर गौतम याद करने की कोसिश करता है कि कैसे उसने अपनी सुहागरात को अंजाम दिया था तो पता नहीं क्यो गौतम की याददस्त ज्यादा ब्योरा नहीं जूटा पाती है | ऐसे ही हम चार यार बैठ पुरानो दिनो की याद को सहेज रहे थे | फिर गौतम ने अपने विचारो के बताते हुए एक बड़ा ही रोचक वाक्य सुनाया |


दोस्त गौतम ने बताया जब है 5वी या 6वी क्लास मे था तो उसके माता पिता को कही बाहर जाना था तो माता पिता जाने से पहले गौतम को चाचा चाची के पास छोड़ गए |
सोते वक्त चाची चाचा ने भाई के बच्चे के सामने कोड भाषा मे कुछ बाते की जो आज 50 साल के उम्र हो जाने के बाद भी मित्र को याद है | जो बाते हुई वह इस तरह की थी -

चाचा - और अब क्या हाल है ??
चाची - इतने बेसब्र न हो और मुन्ने को समझाओ | आज दूसरा दिन है और अभी कई दिन इधर आना मना है |
चाचा - पता नही क्यो, और दिनो मे तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ता, मगर जब मुन्नी को 4-5 दिन दिन के लिए ताले मे बंद कर देती हो तो मुन्ना कुछ ज्यादा परेशान हो जाता है |
चाची - ये क्या मेरे हाथ मे है ? अपनी दुकान मे ध्यान लगाओ मुन्ने का ध्यान भी बंट जाएगा |


I Love You को दूसरी भाषा ने क्या कहते है
दोस्त ने तुरंत गौतम से सवाल किया क्या तुम्हें तब पता चला था ये मुन्ना मुन्नी कौन है ?? गौतम ने जवाब दिया "नहीं" तब उत्सावपूर्वक चाचा से पूछा था कि ये मुन्ना मुन्नी कौन है तो जवाब मे उन्होने पड़ोसी के बच्चे का नाम लिया था लेकिन असल बात तो बहुत समय बाद समझ मे आई और शादी के बाद जब मैंने खुद गुड्डा गुड्डी का कोड वर्ड बनाया तो बचपन मे सुना वार्तालाप दिमाग मे फ्रिज हो ही गया |